
इतरो ईज फगत सोधूं l
मुळकणियों बखत सोधूं l
आगीवाण हुवै कुण सो
निजर बा'वडै गत सोधूं l
लांबी जीभ लपरका लै
पड़ी पांगली पत सोधूं l
सीलो साव जमारै रो
रातो रंग रगत सोधूं l
सांकळ जड़िया जूण जियां
मिनखाचार मुगत सोधूं l
राजस्थानी भासा रै मांय पंचलड़ी....उर्दू हिंदी री ग़ज़ल रै सांकडै ई ठेरै आ पंचलड़ी...पांच लड्याँ मांय पोएड़ी पंचलड़ी ...हरेक लड़ी रै मांय दोनूं मिसरा बरोबर मात्रावां राखै ..राजस्थानी रा घणा चावा अर ठावा कवि आदरजोग ओम पुरोहित 'कागद' इण विधा नै पेलपोत केवटी ही ...कागद जी ही इण नै नांव दियो..पंचलड़ी..