रविवार, 13 मार्च 2011

पंचलड़ी


धूडां सूं चिणगार उठैला
ताप तावडै थार उठैला

खेतां खेडां सगळी ठौड़
लूवां लपटां डार उठैला

धोरां री धरती कद जानै
उच्छब इण दरबार उठैला

रातो तातो अगन पुहुप
रोहीडै सिणगार उठैला

जीवण बेलां हरियळ पाना
ऊन्यालै परबार उठैला

2 टिप्‍पणियां:

  1. व्हाला भाई चैन सिंह शेखावत जी
    घणैमान रामराम !

    सबसूं पैलां तो कैवणो चावूं कै आदरजोग सांवर जी दइया री पंचलड़ी री एक पोथी आ सदी मिजळी मरै 1996 में छपी थकी म्हारै खनै है ।
    स्यात औ पैलो संस्करण कोनी ,क्यूं कै बां'रो देहावसान 1992 में हुयग्यो हो … ।

    इण पर पंचलड़ी कवितावां नांव भी लिख्योड़ो है ।

    अबै कागदजी ही बता सकै कै पांच पांच शे'रनुमा चरण वाळी ग़ज़लनुमा इण छांदस रचनावां री शरूवात कुण करी … :)

    हालांकि आ बात घणी महताऊ भी कोनी लखावै , पण आप लिखिया हो जद प्रसंगवश कैवूं …

    ***************************************************

    आपरी रचना भी आछी है … पण जद मात्रावां री गिणत रौ आप कह रया हो तो ,

    खेतां खेडां सगळी ठौड़
    अर
    रातो तातो अगन पुहुप

    अठै मात्रावां गड़बड़ीज रयी है , लागै ध्यान चूकग्यो … :)


    उम्मीद करूं , नाराज़ नीं हुवोला …

    नुंवै ब्लॉग खा्तर बधाई भी है …

    हियतळ सूं बधाई !

    मंगलकामनावां !!

    ♥होळी री आगूंच शुभकामनावां !!!♥


    - राजेन्द्र स्वर्णकार

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